Tuesday, October 11, 2016

Hanuman Ji History In Mahabharat

Lord Hanuman is well known for his extreme devotion to Lord Rama. Lord Hanuman is always depicted in the Indian folklaire as an icon of true devotion and a symbol of the power of true devotion and chastity.
Lord Hanuman's devotion to Lord Rama is symbolic of the devotion of the enlightened individual soul towards the supreme soul.
Many stories from the Indian literature tell the tales of Lord Hanuman protecting devotees of Lord Rama and helping those who seek his either spiritually or otherwise. Swami Tulasidas has written these lines in respect of Lord Hanuman's great character, in praise of his powers and also devotion.





Hanuman Ji History In Mahabharat:



रथ के छत्र पर

DECEMBER 12, 2014 BY AG 1 COMMENT

Bhima Hanuman Mahabharata Hindi Story : धर्म ग्रंथो के अनुसार हनुमानजी और भीम भाई है क्योंकि दोनों ही पवन देवता के पुत्र है। महाभारत में एक प्रसंग आता है जब भीम और हनुमान की मुलाक़ात होती है। आज हम आपको वोही प्रसंग विस्तारपूर्वक बता रहे है। साथ ही इस प्रसंग का सम्बन्ध उस मान्यता से भी है जिसके अनुसार महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण, अर्जुन के जिस रथ के सारथी बने थे उस रथ के छत्र पर स्वयं हनुमानजी विराजित थे। इसलिए आज भी अर्जुन के रथ की पताका में हनुमानजी को दर्शाया जाता है। तो आइए जानते है क्या है ये प्रसंग ?
Hanuman-Bheema Story
भीम-हनुमानजी प्रसंग-

वनवास के दौरान पांडव जब बदरिकाश्रम में रह रहे थे तभी एक दिन वहां उड़ते हुए एक सहस्त्रदल कमल आ गया। उसकी गंध बहुत ही मनमोहक थी। उस कमल को द्रौपदी ने देख लिया। द्रौपदी ने उसे उठा लिया और भीम से कहा- यह कमल बहुत ही सुंदर है। मैं यह कमल धर्मराज युधिष्ठिर को भेंट करूंगी। अगर आप मुझसे प्रेम करते हैं तो ऐसे बहुत से कमल मेरे लिए लेकर आइये।


 
द्रौपदी के ऐसा कहने पर भीम उस दिशा की ओर चल दिए, जिधर से वह कमल उड़ कर आया था। भीम के चलने से बादलों के समान भीषण आवाज आती थी, जिससे घबराकर उस स्थान पर रहने वाले पशु-पक्षी अपना आश्रय छोड़कर भागने लगे।

कमल पुष्प की खोज में चलते-चलते भीम एक केले के बगीचे में पहुंच गए। यह बगीचा गंधमादन पर्वत की चोटी पर कई योजन लंबा-चौड़ा था। भीम नि:संकोच उस बगीचे में घुस गए। इस बगीचे में भगवान श्रीहनुमान रहते थे। उन्हें अपने भाई भीमसेन के वहां आने का पता लग गया।

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हनुमानजी ने सोचा कि यह मार्ग भीम के लिए उचित नहीं है। यह सोचकर उनकी रक्षा करने के विचार से वे केले के बगीचे में से होकर जाने वाले सकड़े मार्ग को रोककर लेट गए।

चलते-चलते भीम को बगीचे के सकड़े मार्ग पर लेटे हुए वानरराज हनुमान दिखाई दिए। उनके ओठ पतले थे, जीभ और मुंह लाल थे, कानों का रंग भी लाल-लाल था, भौंहें चंचल थीं तथा खुले हुए मुख में सफेद, नुकीले और तीखे दांत और दाढ़ें दिखती थीं। बगीचे में इस प्रकार एक वानर को लेटे हुए देखकर भीम उनके पास पहुंचे और जोर से गर्जना की।


 
हनुमानजी ने अपने नेत्र खोलकर उपेक्षापूर्वक भीम की ओर देखा और कहा – तुम कौन हो और यहां क्या कर रहे हो। मैं रोगी हूं, यहां आनंद से सो रहा था, तुमने मुझे क्यों जगा दिया। यहां से आगे यह पर्वत अगम्य है, इस पर कोई नहीं चढ़ सकता। अत: तुम यहां से चले जाओ।

हनुमानजी की बात सुनकर भीम बोले- वानरराज। आप कौन हैं और यहां क्या कर रहे हैं? मैं तो चंद्रवंश के अंतर्गत कुुरुवंश में उत्पन्न हुआ हूं। मैंने माता कुंती के गर्भ से जन्म लिया है और मैं महाराज पाण्डु का पुत्र हूं। लोग मुझे वायुपुत्र भी कहते हैं। मेरा नाम भीम है।


 
भीम की बात सुनकर हनुमानजी बोले- मैं तो बंदर हूं, तुम जो इस मार्ग से जाना चाहते हो तो मैं तुम्हें इधर से नहीं जाने दूंगा। अच्छा तो यही हो कि तुम यहां से लौट जाओ, नहीं तो मारे जाओगे।

यह सुनकर भीम ने कहा – मैं मरुं या बचूं, तुमसे तो इस विषय में नहीं पूछ रहा हूं। तुम उठकर मुझे रास्ता दो।


 
हनुमान बोले- मैं रोग से पीडि़त हूं, यदि तुम्हें जाना ही है तो मुझे लांघकर चले जाओ।

Hanuman-Bhima Story
भीम बोले- संसार के सभी प्राणियों में ईश्वर का वास है, इसलिए मैं तुम्हारा लंघन कर परमात्मा का अपमान नहीं करुंगा। यदि मुझे परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान न होता तो मैं तुम्ही को क्या, इस पर्वत को भी उसी प्रकार लांघ जाता जैसे हनुमानजी समुद्र को लांघ गए थे।

हनुमानजी ने कहा- यह हनुमान कौन था, जो समुद्र को लांघ गया था? उसके विषय में तुम कुछ कह सकते हो तो कहो।

भीम बोले- वे वानरप्रवर मेरे भाई हैं। वे बुद्धि, बल और उत्साह से संपन्न तथा बड़े गुणवान हैं और रामायण में बहुत ही विख्यात हैं। वे श्रीरामचंद्रजी की पत्नी सीताजी की खोज करने के लिए एक ही छलांग में सौ योजन बड़ा समुद्र लांघ गए थे। मैं भी बल और पराक्रम में उन्हीं के समान हूं। इसलिए तुम खड़े हो जाओ मुझे रास्ता दो। यदि मेरी आज्ञा नहीं मानोगे तो मैं तुम्हें यमपुरी पहुंचा दूंगा।

भीम की बात सुनकर हनुमानजी बोले- हे वीर। तुम क्रोध न करो, बुढ़ापे के कारण मुझमें उठने की शक्ति नहीं है इसलिए कृपा करके मेरी पूंछ हटाकर निकल जाओ।

यह सुनकर भीम हंसकर अपने बाएं हाथ से हनुमानजी पूंछ उठाने लगे, किंतु वे उसे टस से मस न कर सके। फिर उन्होंने दोनों हाथों से पूंछ उठाने का  प्रयास किया लेकिन इस बार भी वे असफल रहे। तब भीम लज्जा से मुख नीचे करके वानरराज के पास पहुंचे और कहा- आप कौन हैं? अपना परिचय दीजिए और मेरे कटु वचनों के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए।

तब हनुमानजी ने अपना परिचय देते हुए कहा कि इस मार्ग में देवता रहते हैं, मनुष्यों के लिए यह मार्ग सुरक्षित नहीं है, इसीलिए मैंने तुम्हें रोका था। तुम जहां जाने के लिए आए हो, वह सरोवर तो यहीं है।

हनुमानजी की बात सुनकर भीम बहुत प्रसन्न हुए और बोले- आज मेरे समान कोई भाग्यवान नहीं है। आज मुझे अपने बड़े भाई के दर्शन हुए हैं। किंतु मेरी एक इच्छा है, वह आपको अवश्य पूरी करनी होगी। समुद्र को लांघते समय आपने जो विशाल रूप धारण किया था, उसे मैं देखना चाहता हूं।

भीम के ऐसा कहने पर हनुमानजी ने कहा- तुम उस रूप को नहीं देख सकते और न कोई अन्य पुरुष उसे देख सकता है। सतयुग का समय दूसरा था और त्रेता और द्वापर का भी दूसरा है। काल तो निरंतर क्षय करने वाला है, अब मेरा वह रूप है ही नहीं।

तब भीमसेन ने कहा- आप मुझे युगों की संख्या और प्रत्येक युग के आचार, धर्म, अर्थ और काम के रहस्य, कर्मफल का स्वरूप तथा उत्पत्ति और विनाश के बारे में बताइए।

भीम के आग्रह पर हनुमानजी ने उन्हें कृतयुग, त्रेतायुग फिर द्वापरयुग व अंत में कलयुग के बारे में बताया।
हनुमानजी ने कहा कि- अब शीघ्र ही कलयुग आने वाला है। इसलिए तुम्हें जो मेरा पूर्व रूप देखना है, वह संभव नहीं है।

हनुमानजी की बात सुनकर भीम बोले- आपके उस विशाल रूप को देखे बिना मैं यहां से नहीं जाऊंगा। यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो मुझे उस रूप में दर्शन दीजिए।

भीम के इस प्रकार कहने पर हनुमानजी ने अपना विशाल रूप दिखाया, जो उन्होंने समुद्र लांघते समय धारण किया था। हनुमानजी के उस रूप के सामने वह केलों का बगीचा भी ढंक गया। भीमसेन अपने भाई का यह रूप देखकर आश्चर्यचकित हो गए।

फिर भीम ने कहा- हनुमानजी। मैंने आपके इस विशाल रूप को देख लिया है। अब आप अपने इस स्वरूप को समेट लीजिए। आप तो उगते हुए सूर्य के समान हैं, मैं आपकी ओर देख नहीं सकता।

भीम के ऐसा कहने पर हनुमानजी अपने मूल स्वरूप में आ गए और उन्होंने भीम को अपने गले से लगा लिया। इससे तुरंत ही भीम की सारी थकावट दूर हो गई और सब प्रकार की अनुकूलता का अनुभव होने लगा।

गले लगाने के बाद हनुमानजी भीमसेन से कहा कि- भैया भीम। अब तुम जाओ, मैं इस स्थान पर रहता हूं- यह बात किसी से मत कहना। भाई होने के नाते तुम मुझसे कोई वर मांगो। तुम्हारी इच्छा हो तो मैं हस्तिनापुर में जाकर धृतराष्ट्र पुत्रों को मार डालूं या पत्थरों से उस नगर को नष्ट कर दूं अथवा दुर्योधन को बांधकर तुम्हारे पास ले आऊं। तुम्हारी जैसी इच्छा हो, उसे मैं पूर्ण कर सकता हूं।
हनुमानजी बात सुनकर भीम बड़े प्रसन्न हुए और बोले- हे वानरराज। आपका मंगल हो। आपने जो कहे हैं वह काम तो होकर ही रहेंगे। बस, आपकी दयादृष्टि बनी रहे- यही मैं चाहता हूं।

भीम के ऐसा कहने पर हनुमानजी ने कहा- भाई होने के नाते मैं तुम्हारा प्रिय करूंगा। जिस समय तुम शत्रु सेना में घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपने शब्दों से तुम्हारी गर्जना को बढ़ा दूंगा तथा अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठा हुआ ऐसी भीषण गर्जना करुंगा, जिससे शत्रुओं के प्राण सूख जाएंगे और तुम उन्हें आसानी से मार सकोगे। ऐसा कहकर हनुमानजी ने भीमसेन को मार्ग दिखाया और अंतर्धान हो गए।

आनंद रामायण में है कुछ अलग है कहानी –

राम के जीवन के ऊपर अनेकों रामायण लिखी गई है। इन अलग-अलग रामायण में कुछ प्रसंगो को अलग-अलग ढंग से बताया गया है। जैसे की अदभुत रामायण में सीता को रावण की बेटी बताया गया है। इसी प्रकार आनंद रामायण में हनुमाजी के अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजित होने के पीछे कुछ अलग ही कथा है।

आनंद रामायण के अनुसार एक बार किसी रामेश्वरम तीर्थ में अर्जुन का हनुमानजी से मिलन हो जाता है। इस पहली मुलाकात में हनुमानजी से अर्जुन ने कहा- ‘अरे राम और रावण के युद्घ के समय तो आप थे?’

हनुमानजी- ‘हां’, तभी अर्जुन ने कहा- ‘आपके स्वामी श्रीराम तो बड़े ही श्रेष्ठ धनुषधारी थे तो फिर उन्होंने समुद्र पार जाने के लिए पत्थरों का सेतु बनवाने की क्या आवश्यकता थी? यदि मैं वहां उपस्थित होता तो समुद्र पर बाणों का सेतु बना देता जिस पर चढ़कर आपका पूरा वानर दल समुद्र पार कर लेता।’

इस पर हनुमानजी ने कहा- ‘असंभव, बाणों का सेतु वहां पर कोई काम नहीं कर पाता। हमारा यदि एक भी वानर चढ़ता तो बाणों का सेतु छिन्न-भिन्न हो जाता।’

अर्जुन ने कहा- ‘नहीं, देखो ये सामने सरोवर है। मैं उस पर बाणों का एक सेतु बनाता हूं। आप इस पर चढ़कर सरोवर को आसानी से पार कर लेंगे।’

हनुमानजी ने कहा- ‘असंभव।’

तब अर्जुन ने कहा- ‘यदि आपके चलने से सेतु टूट जाएगा तो मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊंगा और यदि नहीं टूटता है तो आपको अग्नि में प्रवेश करना पड़ेगा।’

हनुमानजी ने कहा- ‘मुझे स्वीकार है। मेरे दो चरण ही इसने झेल लिए तो मैं हार स्वीकार कर लूंगा।’

तब अर्जुन ने अपने प्रचंड बाणों से सेतु तैयार कर दिया। जब तक सेतु बनकर तैयार नहीं हुआ, तब तक तो हनुमान अपने लघु रूप में ही रहे, लेकिन जैसे ही सेतु तैयार हुआ हनुमान ने विराट रूप धारण कर लिया।

हनुमान राम का स्मरण करते हुए उस बाणों के सेतु पर चढ़ गए। पहला पग रखते ही सेतु सारा का सारा डगमगाने लगा, दूसरा पैर रखते ही चरमराया और तीसरा पैर रखते ही सरोवर के जल में खून ही खून हो गया।

तभी श्रीहनुमानजी सेतु से नीचे उतर आए और अर्जुन से कहा कि अग्नि तैयार करो। अग्नि प्रज्वलित हुई और जैसे ही हनुमान अग्नि में कूदने चले, वैसे भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो गए और बोले ‘ठहरो!’ तभी अर्जुन और हनुमान ने उन्हें प्रणाम किया।

भगवान ने सारा प्रसंग जानने के बाद कहा- ‘हे हनुमान, आपका तीसरा पग सेतु पर पड़ा, उस समय मैं कछुआ बनकर सेतु के नीचे लेटा हुआ था। आपकी शक्ति से आपके पैर रखते ही मेरे कछुआ रूप से रक्त निकल गया। यह सेतु टूट तो पहले ही पग में जाता यदि में कछुआ रूप में नहीं होता तो।’

यह सुनकर हनुमान को काफी कष्ट हुआ और उन्होंने क्षमा मांगी। ‘मैं तो बड़ा अपराधी निकला, जो आपकी पीठ पर मैंने पैर रख दिया। मेरा ये अपराध कैसे दूर होगा भगवन्?’ तब कृष्ण ने कहा, ये सब मेरी इच्छा से हुआ है। आप मन खिन्न मत करो और मेरी इच्छा है कि तुम अर्जुन के रथ की ध्वजा पर स्थान ग्रहण करो।

भारत के मंदिरों के बारे में यहाँ पढ़े –  भारत के अदभुत मंदिर

सम्पूर्ण पौराणिक कहानियाँ यहाँ पढ़े – पौराणिक कथाओं का विशाल संग्रह

Hanuman Ji History In Mahabharata

Lord Hanuman is well known for his extreme devotion to Lord Rama. Lord Hanuman is always depicted in the Indian folklaire as an icon of true devotion and a symbol of the power of true devotion and chastity.
Lord Hanuman's devotion to Lord Rama is symbolic of the devotion of the enlightened individual soul towards the supreme soul.
Many stories from the Indian literature tell the tales of Lord Hanuman protecting devotees of Lord Rama and helping those who seek his either spiritually or otherwise. Swami Tulasidas has written these lines in respect of Lord Hanuman's great character, in praise of his powers and also devotion.



Hanuman Ji History In Mahabharata:


Hanuman is also considered to be the brother of Bhima, on the basis of their having the same father, Vayu. During the Pandavas' exile, he appears disguised as a weak and aged monkey to Bhima in order to subdue his arrogance. Bhima enters a field where Hanuman is lying with his tail blocking the way. Bhima, unaware of his identity, tells him to move it out of the way. Hanuman, incognito, refuses. Bhima then tries to move the tail himself but he is unable, despite his great strength. Realising he is no ordinary monkey, he inquires as to Hanuman's identity, which is then revealed. At Bhima's request, Hanuman is also said to have enlarged himself to demonstrate the proportions he had assumed in his crossing of the sea as he journeyed to Lanka and also said that when the war came, he would be there to protect the Pandavas. Pandupole is claimed as the place where this meeting happened.

During the great battle of Kurukshetra, Arjuna entered the battlefield with a flag displaying Hanuman on his chariot.[23] The incident that led to this was an earlier encounter between Hanuman and Arjuna, wherein Hanuman appeared as a small talking monkey before Arjuna at Rameshwaram, where Rama had built the great bridge to cross over to Lanka to rescue Sita. Upon Arjuna's wondering aloud at Rama's taking the help of monkeys rather than building a bridge of arrows, Hanuman challenged him to build a bridge capable of bearing him alone; Arjuna, unaware of the vanara's true identity, accepted. Hanuman then proceeded to repeatedly destroy the bridges made by Arjuna, who decided to take his own life. Krishna smiled and placed his divine discus beneath the bridge, and this time Hanuman could no longer break it.Vishnu then appeared before them both after originally coming in the form of a tortoise, chiding Arjuna for his vanity and Hanuman for making Arjuna feel incompetent. As an act of penitence, Hanuman decided to help Arjuna by stabilizing and strengthening his chariot during the imminent great battle. But during the great battle between Karna and Arjuna, even Hanuman failed to stabilize the chariot of Arjuna and Krishna praised Karna for this feat.[24] After, the battle of Kurukshetra was over, Krishna asked Arjuna, that today you step down the chariot before me. After Arjuna got down, Krishna followed him and thanked Hanuman for staying with them during the whole fight in the form of a flag on the chariot. Hanuman came in his original form, bowed to Krishna and left the flag, flying away into the sky. As soon as he left the flag, the chariot began to burn and turned into ashes. Arjuna was shocked to see this, then Krishna told Arjuna, that the only reason his chariot was still standing was because of the presence of Himself and Hanuman, otherwise, it would have burnt many days ago due to effects of celestial weapons thrown at it in the war.

According to legend, Hanuman is one of the four people to have heard the Bhagwad Gita from Krishna and seen his Vishvarupa (universal) form, the other three being Arjuna, Sanjaya and Barbarika, son of Ghatotkacha and also Bhishma at the time of his death.

Jain Version[edit]
Main articles: Rama in Jainism and Salakapurusa
Paumacariya (also known as Pauma Chariu or Padmacharit), the Jain version of Ramayana written by Vimalasuri, mentions Hanuman as a Vidyadhara (a supernatural being), who is the son of Pavangati and Anjana Sundari. Anjana gives birth to Hanuman in a forest cave, after being banished by her in-laws. Her maternal uncle rescues her from the forest; while boarding his vimana, Anjana accidentally drops her baby on a rock. However, the baby remains uninjured while the rock is shattered. The baby is raised in Hanuruha, his great uncle's island kingdom, from which Hanuman gets his name. In this version, Hanuman is not celibate. He marries princess Anangakusuma, the daughter of Kharadushana and Ravana's sister Chandranakha. Ravana also presents Hanuman one of his nieces as a second wife. After becoming an ally of Sugriva, Hanuman acquires a hundred more wives. Hanuman is originally enraged at Rama for murdering his father-in-law Kharadushana. However, he becomes a supporter of Rama after meeting him and learning about Sita's kidnapping by Ravana. He goes to Lanka on Rama's behalf, but is unable to convince Ravana to surrender. Ultimately, he joins Rama in the war against Ravana and performs several heroic deeds. After the victory and subsequent celebrations, both Rama and Hanuman take Jaineshwari Diksha and become Jain Munis and achieve salvation.[2]:50–51 Later Jain texts such as Uttarapurana (9th century CE) by Gunabhadra and Anjana-Pavananjaya (12th century CE) tell the same story.

Other texts[edit]

Indonesian Javanese wayang representation of Hanuman.

Hanuman is characterized as a celibate in most Indian texts. However, in the Khmer Reamker and Thai Ramakien, Hanuman falls in love with the pretty mermaid Suvannamaccha.[25]
Apart from Ramayana and Mahabharata, Hanuman is mentioned in several other texts. Some of these stories add to his adventures mentioned in the earlier epics, while others tell alternative stories of his life.

The Brahma Purana mentions that the vanaras built several Shiva lingams in Kishkindha. After his return to Ayodhya, Rama asks Hanuman to destroy these lingams, as they are no longer required. However, when Hanuman is unable to uproot these lingams, Rama orders them to worshipped permanently. The Skanda Purana mentions a variant of this story, which happens in Rameswaram.[26] The Narada Purana describes Hanuman as a master of vocal music, and as an embodiment of the combined power of Shiva and Vishnu.

Apart from the Puranas, the Agama Saunaka Samhitha, and Agastya Sara Samhitha explains certain stories which are not mentioned in other Hindu texts along with the worship rituals of Hanuman.

The 16th-century Indian poet Tulsidas wrote Hanuman Chalisa, a devotional song dedicated to Hanuman. He claimed to have visions where he met face to face with Hanuman. Based on these meetings, he wrote Ramcharitmanas, an Awadhi language version of Ramayana.[27] The Sankat Mochan Hanuman Temple (Varanasi) is said to be located on the spot where Tulsidas had these visions. The works of Tulsidas played an important role in increasing the popularity of Hanuman worship in North India.

Durga Chalisa mentions that Hanuman leads and welcomes the procession of the ferocious lion-riding Bhavani.

The non-Indian versions of Ramayana, such as the Thai Ramakien, mention that Hanuman had relationships with multiple women, including Svayamprabha, Benjakaya (Vibhisana's daughter), Suvannamaccha and even Ravana's wife Mandodari.[6] According to these versions of the Ramayana, Macchanu is son of Hanuman borne by Suvannamaccha, daughter of Ravana.[28][29][30] The Jain text Paumacariya also mentions that Hanuman married Lankasundari, the daughter of Lanka's chief defender Bajramukha.[31] Another legend says that a demigod named Matsyaraja (also known as Makardhwaja or Matsyagarbha) claimed to be his son. Matsyaraja's birth is explained as follows: a fish (matsya) was impregnated by the drops of Hanuman's sweat, while he was bathing in the ocean.[6] According to Parasara Samhita, Hanuman married Suvarchala, the daughter of Surya (the Sun god).[32]

Immortality and Afterlife[edit]
Hanuman's cultural impact extends beyond the epic in which his deeds are celebrated. Hanuman is widely believed to be immortal;[33] thus, although he is a principal figure in the great epic Ramayana, he also makes an appearance in the (historically later, but equally famous) epic Mahabharata, where he meets the hero Bhima.

It is traditionally claimed that Hanuman is present wherever the Ramayana is read:[34]

अमलकमलवर्णं प्रज्ज्वलत्पावकाक्षं सरसिजनिभवक्त्रं सर्वदा सुप्रसन्नम् |
पटुतरघनगात्रं कुण्डलालङ्कृताङ्गं रणजयकरवालं वानरेशं नमामि ||

यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् ।
बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ॥

yatra yatra raghunāthakīrtanaṃ tatra tatra kṛta mastakāñjalim ।
bāṣpavāriparipūrṇalocanaṃ mārutiṃ namata rākṣasāntakam ॥

Bow down to Hanumān, who is the slayer of demons, and who is present with head bowed and eyes full of flowing tears wherever the fame of Rāma is sung.
[citation needed]
Similar claims can be found in other texts, such as the Vinaya Patrika by Tulsidas, with only slight variations in language. During readings of the Ramayana, a special puja and space ("asana", or seat) are reserved for Hanuman.

A number of religious leaders have claimed to have seen Hanuman over the course of the centuries, notably Madhvacharya (13th cent. CE), Tulsidas (16th cent.), Samarth Ramdas (17th cent.), Raghavendra Swami (17th cent.) and Swami Ramdas (20th cent.).